गोपालदास के पुल पर बाबा की पूजा हेतु चबूतरा बनाने की शुरुआत

बीते बृहस्पतिवार को पुल पर निर्मित उस चबूतरे पर बाबा के नाम पर एक श्रद्धालु पूजा करते दिखे*


सुलतानपुर। आठ प्रदेशों में सक्रिय हजारों सदस्यों वाली रजिस्टर्ड संस्था पत्रकार एकता संघ के राष्ट्रीय प्रभारी डी पी गुप्ता एडवोकेट ने जिला अधिकारी सुल्तानपुर, अधिशाषी अभियन्ता प्रांतीय खंड लोक निर्माण विभाग व उन सभी लोगों का आभार जताया जिनकी वजह से पुल पर गोपालदास बाबा के नाम का एक चबूतरा पुनः निर्मित हो सका। इसमें गोपालदास बाबा की विशेष कृपा रही।सुखद बात यह है कि कल बृहस्पतिवार के दिन वहां एक भक्त पूजा करते दिखे।

विदित हो कि उक्त पुल पर गोपालदास बाबा के नाम से एक छोटा चबूतरा या‌ मंदिर बनवाए जाने की मांग जिला प्रशासन से समाजसेवी पत्रकार डी पी गुप्ता एडवोकेट ने पिछले माह किया था जिस पर कार्यवाही करते हुए प्रशासन ने पुल पर एक छोटा मंदिर नुमा स्थान बनवा दिया है और इस आशय की सूचना अधिशाषी अभियंता प्रांतीय खंड लोक निर्माण विभाग द्वारा समाजसेवी पत्रकार डी पी गुप्ता एडवोकेट को लिखित रूप से देते हुए कहा कि आन लाइन संदर्भ संख्या 40017924004372 का निस्तारण करते हुए उतरौला - अयोध्या - प्रयागराज मार्ग (चैनेज 136.5)पर पूर्व निर्मित क्षतिग्रस्त गोपालदास बाबा पुल के स्थान पर चार लेन लघु सेतु पर बाबा की पूजा हेतु पुल के किनारे चबूतरा बनाने की कार्यवाही की जा रही है। प्रशासन के इस सराहनीय कार्य से अशोक पाण्डे,राजेन्द्र मूर्तिकार, राम निवास सोनी, अरविन्द चौरसिया,अमित गुप्ता, पप्पन मोदनवाल, सुनील कुमार, रामदीन अग्रहरि, अनिल कुमार, शिक्षक राम मिलन मोदनवाल, भगवान फलवाले आदि तमाम क्षेत्रवासियों में हर्ष व्याप्त है। बस स्टेशन के 50 वर्षीय मिठाई व्यवसायी पवन कुमार मोदनवाल ने अपना अनुभव साझा करते हुए बताया कि बचपन में उनकी मां ने अपने साथ घटी एक घटना‌ बतायी थी कि 70-75 साल पहले यह इलाका बहुत विरान रहता था और तब करुणाश्रय हास्पिटल भी नहीं बना था केवल गिरजाघर था। उनकी मां किसी कार्य हेतु जीएन रोड के अपने मकान से शाम को वर्तमान डाकखाना चौराहा होते हुए बस स्टेशन पर अपनी दुकान पर आने के लिए निकली और वर्तमान तिकोनिया पार्क के आस पास आने पर रास्ता भटक गई और उनके समझ में कुछ नहीं आ रहा था कि वे किधर जाएं इस कारण वे बहुत परेशान थी तभी वहां एक बाबा आ गये और उनको रास्ता दिखाते हुए बस स्टेशन तक पहुंचा कर न जाने कहां चले गए। उस जमाने में सैकड़ों लोग ऐसे थे जिन्हें बाबा साक्षात प्रगट हो कर उनकी मदद किये थे और वे सब बाबा के होने के साक्षी रहे। पवन कुमार मोदनवाल अपनी मां द्वारा उनके बचपन में बताई गई इस सच्ची घटना को बताते हुए बाबा के प्रति अगाध श्रद्धा में डूब गए।

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