सनातन धर्म में देवप्रिय मांगलिक मिठाई लड्डू का अस्तित्व भगवान श्री गणेश के अवतरण काल से है
त्रेतायुग में श्री हनुमान जी और द्वापरयुग भगवान लड्डूगोपाल कृष्ण ने लड्डू को अपना प्रिय मिष्ठान्न बनाया
सुलतानपुर। नमो इंडिया के नेशनल चेयरमैन डी पी गुप्ता एडवोकेट ने मांगलिक मिठाई लड्डू और इसके निर्माताओ की उत्पत्ति काल को लेकर वर्तमान हलवाई समाज के समक्ष अपना एक शोध पत्र प्रस्तुत किया है। हिंदू सनातन धर्म में व भारतीय मिठाइयों में मोतीचूर का लड्डू अनादि काल से देवताओं द्वारा पसंद की जाने वाली एक मांगलिक मिठाई रही है। धार्मिक ग्रंथों में सर्वप्रथम सतयुग में लड्डू का उल्लेख तब मिलता है जब भगवान श्री गणेश संसार में अवतरित होते हैं और उनको बाल्य अवस्था से लड्डू अर्थात मोदक बहुत प्रिय था और आज लाखों साल बाद भी भगवान श्री गणेश को लड्डू अर्थात मोदक चढ़ाया जाता है। इसके उपरांत त्रेतायुग में श्री हनुमान जी का अवतरण होता है और उन्हें भी लड्डू मिठाई बहुत प्रिय रहा और आज कलियुग में उनके हर मंदिर में लड्डुओं को प्रसाद के रूप में चढ़ाया जाता है। पुनः द्वापर युग में भगवान श्रीकृष्ण का अवतरण हुआ और बाल्यावस्था में उन्हें भी लड्डू मिठाई बहुत प्रिय रही और आज कलियुग में दुनिया भर के मंदिरों और घर घर में उनके लड्डूगोपाल स्वरूप की सबसे ज्यादा पूजा होती है। अब इन सभी प्रामाणिक साक्ष्य का अवलोकन करें तो यही निष्कर्ष निकलता है कि सतयुग, त्रेतायुग, द्वापर और कलियुग चारो युगों में मांगलिक मिठाई लड्डू का उल्लेख धार्मिक ग्रंथों में मिलता है। सतयुग में जब भगवान श्री गणेश ने सर्वप्रथम लड्डू खाया होगा तो निश्चित ही उस लड्डू को किसी न किसी ने जरूर बनाया होगा। बहुत संभावना है कि वह लड्डू मां पार्वती ने बनाया होगा या भगवान श्री गणेश ने स्वयं किसी को प्रेरणा देकर बनवाया होगा। यह एक रहस्य है जो कोई हिंदू धर्म का प्रकांड विद्वान ही बता सकता है। इन सबसे यह प्रमाणित होता है कि मिठाई निर्माण कला सतयुग से शिव परिवार से जुड़ी है और आज के हिंदू मिठाई विक्रेताओं के पूर्वज निश्चित ही भगवान श्रीगणेश के अवतरण के समय कैलाश पर्वत पर उपस्थित रहे होंगे और उनका सीधा संबंध शिव परिवार से रहा होगा। उन्ही के आशीर्वाद से मिष्ठान्न निर्माताओं द्वारा बनाई गई मिठाई अनादि काल से अबतक भगवान के मंदिरों में बिना रोक-टोक चढ़ाई जाती जा रही है। अब आते हैं कलियुग में जब भारत में अरब से मुस्लिम शासकों का आगमन हुआ और उनका यहां हुकूमत स्थापित हो गई तो उनके साथ अरब से हलवा बनाने वाले मुस्लिम कारीगर आये। हलवा एक अरबी शब्द है जिससे हलवाई जाति के सरनेम की उत्पत्ति हुई है। मुगलकालीन समय में मिष्ठान्न विक्रेताओं को हलवाई कहा जाने लगा, जो बाद में सभी मिष्ठान्न विक्रेताओं ने इस हलवाई शब्द को ही अपनी पहचान के साथ जोड़ लिया और खुद को हलवाई ही कहने लगे और आज तक कहते चले आ रहे हैं। ये वही बात हुई जैसे भारत का नाम अंग्रेजों ने इंडिया रक्खा और हम सब भारतीय अपने को इंडियन मानने लगे। अब प्रश्न उठता है कि आज के हिंदू मिष्ठान्न विक्रेताओं संबंध अगर अरबी शब्द हलवाई से नहीं है तो किससे है। इसका सीधा उत्तर है कि लड्डू या मोदक के नाते हम सबका गहरा सम्बन्ध सीधे कैलाश पर्वत और भगवान श्री गणेश व शिव-परिवार से है। ऐसे में हम अपने को गणेशवाल कहें या लड्डूवाल कहें या मोदकवाल कहें जो भी सरनेम चुनेंगे वो सनातन धार्मिक ग्रंथों से अनुमोदित होगा। हम सब अज्ञानता वश लंबे समय से अरबी जुबान के हलवाई लफ्ज़ को अपना सरनेम बनाये घूम रहे हैं और अपने को निम्न मानते चले आ रहे हैं ये सरासर ग़लत है हम सीधे सीधे शिव परिवार का हिस्सा हैं और हमारे पूर्वज देवताओं के कुल से संबंधित है और इसका अनुमोदन श्री गणेश भगवान,श्री बजरंगबली व भगवान श्रीकृष्ण ने मिष्ठान्न निर्माताओं हाथ के बने लड्डू खाकर किया है। अब निर्णय हमारे हाथ में है कि हम अरबी शब्द हलवाई से अपने को जोड़तें हैं या उसके बहुत आगे जाकर अपने को भगवान श्री गणेश के परिवार से जोड़ते हैं। हम स्वतंत्र देश के नागरिक हैं और हम सबका अपना-अपना स्वतंत्र विचार होता। किसी भी तथ्य को किसी समुदाय पर थोपा नहीं जा सकता है परंतु उपरोक्त तर्क़ को ध्यान में रखते हुए मिष्ठान्न निर्माता हलवाई समुदाय के विद्वान बंधुओं को विचार-विमर्श और रिसर्च अवश्य करना चाहिए।
