अटल ने कलाम से कहा ....पटाखा छोड़ना है !

अटल ने कलाम से कहा ....पटाखा छोड़ना है !

राज खन्ना

सुलतानपुर, न्यू गीतांजलि टाइम्स  दिल्ली के फिक्की ऑडिटोरियम में नवंबर 1995 में अटल बिहारी बाजपेई के काव्य संग्रह " मेरी 51 कविताएं " का तत्कालीन प्रधानमंत्री पी.वी.नरसिम्हा राव विमोचन कर रहे थे। राव ने कहा कि अटल जी खराब समय में मेरे गुरु रहे हैं। अटल जी ने जवाब में उन्हें " गुरु घंटाल " बताया और फिर पूरा ऑडिटोरियम ठहाकों से गूंज गया। वास्तविकता में आपसी बातचीत में दोनों एक - दूसरे को गुरु जी ही कहकर ही संबोधित करते थे।  राष्ट्रीय हितों के मुद्दों पर दोनों एकजुट रहे। राव ने अटल के विपक्ष में रहते संयुक्त राष्ट्र में कश्मीर के सवाल पर पाकिस्तान के एक प्रस्ताव के जवाब में देश की एकजुटता प्रदर्शित करने के लिए भारतीय प्रतिनिधि मंडल की अगुवाई उन्हें सौंपी। मशहूर पत्रकार नीरजा चौधरी की चर्चित किताब " How Prime Mininisters Decide " ऐसे कई महत्वपूर्ण प्रसंगों को उजागर करती है। राजनीतिक दलों और उनके नेताओं के बीच बढ़ती कटुता और बिगड़ते बोलों के बीच पढ़िए विरोधी खेमे के दो दिग्गजों के मध्य सहज संवाद - सहयोग और विश्वास से जुड़े कुछ किस्से प्रधानमंत्री के तौर पर अटल जी ने पहली बार 16 मई 1996 को शपथ ली थी। निवर्तमान प्रधानमंत्री नरसिम्हा राव ने 18 मई को उन्हें देश की परमाणु परीक्षण तैयारियों की विस्तार से जानकारी दी। असलियत में राव ने वैज्ञानिकों को इसके परीक्षण की अपने कार्यकाल में ही हरी झंडी दे दी थी। सारी तैयारियां भी हो गई थीं। लेकिन आखिरी मौके पर सैटलाइट तस्वीरों ने अमेरिका को सचेत कर दिया। अमेरिका के जबरदस्त विरोध के कारण चुनाव के मुहाने पर खड़े राव को पैर खींचने पड़े थे। राव से बातचीत के बाद बाजपेई तेजी से इस दिशा में सक्रिय हुए। उन्होंने अपने निजी सचिव शक्ति सिन्हा को सरकार के चीफ साइंटिफिक एडवाइजर ए.पी.जे.अब्दुल कलाम से फौरन मुलाकात तय करने के निर्देश दिए। कलाम उस दिन कोलकाता में थे। उन्हें अगली सुबह प्रधानमंत्री से मिलने के लिए कहा गया। सुबह बाजपेई ने कलाम से कहा " पटाखा छोड़ना है।" कलाम के साथ डी.आर. डी.ओ. के डायरेक्टर के. संथानम भी मौजूद थे। कलाम ने कहा कि उन्हें कुछ समय दीजिए। लेकिन बाजपेई जल्दी में थे। कैबिनेट सेक्रेटरी सुरिंदर सिंह भी इस फैसले से सहमत नहीं थे। उन्हें फिक्र थी कि अगर बाजपेई सरकार अपना बहुमत नहीं साबित कर सकी (जिसकी पूरी संभावना थी) तो इस दूरगामी नतीजों वाले फैसले के लिए वे अगले प्रधानमंत्री को क्या जवाब देंगे ? संथानम के मुताबिक बाजपेई की तेरह दिन चली सरकार के दौरान ही वैज्ञानिक परीक्षण कर सकते थे ,लेकिन उनसे ऊपरी स्तर पर कहा गया कि ऐसा प्रधानमंत्री जिसने अभी विश्वास मत के लिए संसद का सामना नहीं किया है , उसके ऐसे फैसले का क्या औचित्य है,जिसका राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय महत्व है।  बाजपेई के प्रधानमंत्री की शपथ लेते ही अमेरिका भी सशंकित था कि भारत अब परमाणु परीक्षण कर सकता है। अप्रैल 1996 में जब राव प्रधानमंत्री थे तब उनकी सलाह पर अमेरिका में नियुक्त भारत के राजदूत नरेश चंद्रा ने विपक्ष के नेता बाजपेई से दिल्ली में भेंट की थी। अमेरिका ने इस मुलाकात को नोटिस लिया था। बाजपेई की सिर्फ तेरह दिन की सरकार के बीच ही दिल्ली में अमेरिकी राजदूत फ्रैंक वाइसनर  शिष्टाचार भेंट के बहाने उनसे मिलने पहुंच गए थे। नरेश चंद्रा ने बाजपेई को उनकी सुन लेने और सिर्फ इतना उत्तर देने की सलाह दी थी कि भारत अपने अमेरिका से संबंधों को काफी महत्व देता है। बाद में अमेरिका ने  अवर्गीकृत दस्तावेजों के जरिए बताया था कि बाजपेई परीक्षण की पूरी तैयारी में थे। वाइसनर का भी बाजपेई की बॉडी लैंग्वेज के जरिए ऐसा ही आकलन था। बाजपेई इस बड़े काम को तभी कर सकते थे जब उनकी सरकार टिक पाती। यह भी उम्मीद की जाती थी कि अगर वे उस समय न्यूक्लियर परीक्षण कर पाते तो उससे पैदा उन्माद कई दलों को उनके समर्थन के लिए मजबूर कर देता। हालांकि बाजपेई और भाजपा की इस सिलसिले में कोशिशें बेनतीजा रहीं। कांशीराम से खुद बाजपेई ने भेंट की थी। आखिरी कोशिश में जॉर्ज फर्नांडीज ने नरसिम्हा राव से भेंट की थी कि कांग्रेस बाजपेई सरकार को बचाने में मदद करे। राव के भरोसेमंद पी.एम.ओ. में राज्य मंत्री रहे भुवनेश चतुर्वेदी ने यह भेंट  कराई थी। राव का जवाब इंकार का था। राव ऐसा चाहते भी तो उन्हें पता था कि पार्टी उनका साथ नहीं देगी। लोकसभा चुनाव की हार के बाद राव खुद ही अपनी पार्टी के नेताओं के निशाने पर थे   बेशक इस नाजुक मौके पर राव विपक्षी खेमे के अपने दोस्त बाजपेई की मदद न कर पाए हों लेकिन भाजपा के अंदरूनी संघर्ष में वे उनकी सहायता करते नजर आए। भुवनेश चतुर्वेदी के अनुसार अक्टूबर 1995 में यू .एन.ओ. की जनरल असेंबली में राव और बाजपेई के बीच वे बैठे हुए थे। बाजपेई ने उनसे कहा कि वे पी वी से बात करना चाहते हैं। चतुर्वेदी ने कहा कि शाम को होटल में आ जाइए। बाजपेई ने कहा शाम को भी कोई बात की जाती है! तो अभी बात कीजिए ,चतुर्वेदी ने कहा। बाजपेई ने राव से कहा ," कल्याण सिंह हमारे बहुत विरोध में हैं। उन्हें नहीं बनना चाहिए।" राव का शुरुआती जवाब हूं -हां का था। फिर कहा देखते हैं। गवर्नर से बात करेंगे।" मायावती की सरकार से भाजपा ने 17 अक्तूबर 1995 को समर्थन वापस ले लिया था। आडवाणी की पसंद कल्याण सिंह शुरू से ही मायावती को समर्थन के विरोधी थे। पार्टी नेतृत्व को समर्थन वापसी के लिए राजी करने के साथ ही बसपा के 59 विधायकों को अपने पक्ष में करके वे अगली सरकार की अगुवाई के दावेदार थे। होटल वापसी पर भुवनेश चतुर्वेदी ने नरसिम्हा राव से बाजपेई के काम के बारे में पूछा, " करना है उनका क्या। " राव ने हामी भरी ," हां कह दो बोरा जी को।" चतुर्वेदी ने न्यूयार्क से उत्तर प्रदेश के राज्यपाल मोती लाल बोरा को फोन किया ," प्रधानमंत्री कह रहे हैं कि कल्याण सिंह को मुख्यमंत्री नहीं बनना चाहिए।" बोरा ने जवाब दिया कि कल्याण सिंह अपनी सरकार का दावा पेश करने के लिए दूसरे कमरे में बैठे हुए हैं। दूसरी ओर से प्रधानमंत्री की आदेशात्मक इच्छा दोहराई गई। 26 अक्तूबर को प्रधानमंत्री राव की विदेश से वापसी के मौके पर हवाई अड्डे पर उनके स्वागत के लिए मोती लाल बोरा भी मौजूद थे। कल्याण सिंह को सरकार बनाने का मौका नहीं मिला। 27 अक्टूबर 1995 को उत्तर प्रदेश विधानसभा भंग करके अगले चुनाव का रास्ता खोल दिया गया। मदद दोनों ओर से थी। 29 सितंबर 2000 को स्पेशल जज अजित भरिहोक ने राव सरकार के खिलाफ 28 जुलाई 1993 के अविश्वास प्रस्ताव से जुड़े झारखंड मुक्ति मोर्चा केस में नरसिम्हा राव और बूटा सिंह को रिश्वत देने का दोषी ठहराते हुए तीन साल की सजा दी। राव ने बाजपेई से मदद मांगी। भुवनेश चतुर्वेदी के अनुसार वे अटल जी के पास पहुंचे। उन्होंने ब्रजेश मिश्र को बुलाया और कहा , " इसे खत्म कीजिए। " इंद्र कुमार गुजराल ने भी बाजपेई से कहा था कि प्रधानमंत्री और पूर्व प्रधानमंत्रियों के खिलाफ मुकदमें चलाए जाएं , यह अच्छी बात नहीं है। तत्कालीन उप राष्ट्रपति कृष्णकांत ने भी राव की मदद के लिए बाजपेई से कहा था। दिल्ली हाईकोर्ट के जज आर. एस.सोढ़ी ने केस के अकेले वायदा माफ गवाह शैलेंद्र महतो की गवाही को भरोसेमंद नहीं मानते हुए राव और बूटा सिंह को बरी कर दिया था। बाजपेई सरकार ने भाजपा के भीतर से असंतोष के स्वर उठने पर भी इस फैसले के खिलाफ अपील नहीं की थी। बाजपेई और राव दोनों ही ने एक -दूसरे का ख्याल रखा।

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