मुस्कुराई तो हां घूरा तो न !

मुस्कुराई तो हां घूरा तो न !


राज खन्ना

सुलतानपुर, न्यू गीतांजलि टाइम्स छुटपन में मचले। मां ने जिद पूरी कर दी। रूठे। मां ने गले लगा लिया। कहना नहीं माना। झिड़की मिली। रोए। मुंह फुलाए कुछ दूर खड़े कुछ देर पैर पटकते रहे। वो अनदेखी की कोशिश करती। फिर कनखियों से निहार लेती। निगाहें मिलीं। हल्के से मुस्कुराईं। फिर बाहों में जा सिमट गए। मां ने जिंदगी दी। उसकी गोद तो ममता -प्यार का अथाह सागर। उसे देख आंखें चमकतीं। चेहरे पर मुस्कान बिखरती। फिर किलकारी और साथ खिलखिलाना। खड़े होने की कोशिश की। गिरने का डर लगा। डगमगाए। बाहें फैलाए वो हौसला देती रही। गिरे। उठे। फिर - फिर पास बुलाती मां ने खुद के पैरों पर खड़ा किया और चलना सिखा दिया। चले - दौड़े। गिरे - रोए। उधर मां के कलेजे में हूक उठी और उसकी आंखें बरस पड़ीं। उसकी आखें मुस्कराई। सीखा - समझा कि यह सही है। घूरा तो जाना कि वह गलत है। क्या करना क्या नहीं करना इसके पहले पाठ उसी ने तो पढ़ाए। पहली शिक्षक वही रही।  वाणी अपनी फूटी। लेकिन शब्दों से पहला परिचय उसी ने कराया। स्कूल ने तो बाद में कुछ सिखाया। घर - आंगन की सीख - संस्कार जो जीवन के आधार बने सब उसकी ही तो देन हैं। मां - पिता स्कूल लेकर पहुंचे। पहली बार उंगली छूटी। रोने का सिलसिला शुरू हुआ। पिता कहते रहे उधर न देखो। मां पलट - पलट निहारती रही। रोज टिफिन में कुछ अच्छा रखने की कोशिश करती। वापसी में जस - तस या कुछ भी वापस आने पर क्यों नहीं खाया, को लेकर परेशान होती रही।  अब कुछ सीख गए। खुद भी कुछ करने लगे तो खुद को भी कुछ समझने लगे। मां मदद को आगे बढ़ती। रोकते। रहने दो कर लेंगे। लेकिन उसकी जिम्मेदारियां कहां कम हुई। चूल्हा - चौका संभालते और घर को संवारते उसे तो फिक्र हमारे पढ़ने और आगे बढ़ने की भी है। हर समय खेलने से रोकना है। पढ़ने और होम वर्क पूरा करने को कहना है। जवाब में हर समय पढ़ने - पढ़ने की रट लगाए रहती हो,के झुंझलाहट भरे जवाब सुनने हैं। बढ़िया रिजल्ट आने पर उसका चेहरा चमकना है। पिछड़ने पर संग - साथ के परिवारों से सवालों से बचना है। फेल हुए तो खुद से ज्यादा मां को बिसूरना है। शिकायतें बढ़ीं तो मां के लाड़ ने बिगाड़ दिया भी सुनना है। बड़े हो रहे हैं लेकिन मां की निगाह में तो कल जैसे ही हैं। संगी - साथियों साथ एक अलग दुनिया बन रही है लेकिन मां की फिक्र पहले ही जैसी है। नसीहतें भी पहले जैसी। अब बच्चे नहीं हैं , के जवाब उसे मिलने लगे हैं। लेकिन वह कहां गांठ बांधती है। रह -- रह के उसकी अनदेखी लेकिन वो फिर - फिर दोहराती है। स्कूल - कॉलेज से वापसी में देरी उसे परेशान करती है। शाम डूबती है। बेल बजी। दरवाजा खुला। चेहरा दिखा। राहत मिली। कोई और निकला। दिल डूबने लगा। खोज - खबर के लिए बेचैनी बढ़ती है। वापस हुए। बहुत देर कर दी के उसके सवाल के जवाब चुप्पी या नजरंदाज करके आगे बढ़ जाने से मिलने लगे हैं। क्यों फालतू में परेशान होती हो की झिड़कियां भी मिलती हैं। लेकिन अगली शाम - रात फिर वही दोहराती है। क्या करे  वो मां है।  पढ़ना है। नौकरी करनी है। शादी के साथ  एक और परिवार बसना है। जो घर से निकल लिए। मां - पिता का साथ छूटना ही है। अब कभी - कभी मिलना है। कहने भर को संग - साथ रहना है।खुशकिस्मत हैं वे जहां सास , मां बनी रहीं और बहुएं बेटी बन गईं। दामाद बेटे जैसे। ऐसे तमाम घरों में मां हमेशा मां है। सब पर प्यार उड़ेलती। सबका आदर - सम्मान पाती। उम्र के हर दौर में। हर हाल में। आखिरी वक्त तक। जहां ऐसा मुमकिन नहीं वहां अब मां बोझ या जिम्मेदारी है। कहीं कोई पूछने वाला नहीं। तो कहीं छिप - छिप के जब तब  मदद पहुंचती है। फोन पर हाल लिया जा रहा है। उधर से परेशानियों का जिक्र है तो इधर से छुट्टी न मिलने का हवाला है। जिन्होंने उंगली पकड़ चलना सिखाया , उनके लड़खड़ाते कदम अब सहारे तलाशते हैं। अकेलेपन की पीड़ा है। तकलीफों का सिलसिला है। दूसरी तरफ तरक्की की चाहत में आगे निकलने की होड़ में भावनाओं के भंवर जाल से बच निकलना जरूरी है। पैसा बढ़ा है। वृद्धाश्रम भी बढ़े हैं। और ..और बढ़ रहे हैं। ये कैसे थमे  बूढ़े पिता हों या मां वे बोझ न लगें। उनके बिना कैसा परिवार  सिर्फ मदर्स डे पर क्यों ? मां तो हर पल साथ है। एक बार फिर बाहों में लिया जाए। फिर कदमों में बैठा जाए। और जहां मां अब यादों में हैं। वहां भी तो सिर पर हमेशा उसका हाथ है। बहुत दूर से भी तो बहुत पास है। जिंदगी के सबसे अनमोल रिश्ते को प्यार देते हुए शायर मुनव्वर राना याद आए  मेरी ख्वाहिश है कि मैं फिर से फरिश्ता हो जाऊं मां से इस तरह लिपट जाऊं कि बच्चा हो जाऊं इस तरह मेरे गुनाहों को वो धो देती है मां बहुत गुस्से में हो तो रो देती है रोते हुए पोंछे थे किसी दिन आंसू मुद्दतों मां ने नहीं धोया दुपट्टा अपना लबों पे उसके कभी बद्दुआ नहीं होती बस एक मां है जो मुझसे खफा नहीं होती ए अंधेरे ! देख ले तेरा मुंह काला हो गया मां ने आंखें खोल दीं घर में उजाला हो गया

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