लड़ना हो तो इंदिरा लड़ें राजा के तो दूध के दांत भी नहीं उगे जनेश्वर की उस चुनौती की कहानी
राज खन्ना
न्यू गीतांजलि टाइम्स सुल्तानपुर। जनेश्वर मिश्र की एक चुनौती ने लोकसभा चुनाव लड़ने के अनिच्छुक विश्वनाथ प्रताप सिंह को चुनाव मैदान में उतार दिया था। मिश्र ने कहा था कि राजा (विश्वनाथ प्रताप) मुझ से क्या लड़ेंगे ? उनके तो अभी दूध के भी दांत भी नहीं उगे हैं। मुझसे लड़ना हो तो इंदिरा गांधी लड़ें। राजा को सुनकर बुरा लगा। उन्हें लगा कि अब लड़ना ही चाहिए। यह 1971 का लोकसभा चुनाव था। तब विधानसभा के सदस्य विश्वनाथ प्रताप पर हेमवती नंदन बहुगुणा का दबाव था कि वे फूलपुर से लोकसभा का चुनाव लड़ें लेकिन वे हिचक रहे थे।फूलपुर पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू का क्षेत्र रहा था। 1969 के उपचुनाव में छोटे लोहिया के नाम से मशहूर जनेश्वर मिश्र ने केशव देव मालवीय को पराजित करके इस सीट पर कब्जा किया था। 1971 के लोकसभा चुनाव में हेमवती नंदन बहुगुणा इलाहाबाद से कांग्रेस उम्मीदवार थे। विश्वनाथ प्रताप का घरेलू इलाका मांडा (मेजा तहसील) इसी चुनाव क्षेत्र का हिस्सा है। बहुगुणा की सोच थी कि विश्वनाथ प्रताप के फूलपुर से लड़ने पर उनके समर्थकों का उन्हें (बहुगुणा को) अच्छा समर्थन प्राप्त हो सकेगा। कांग्रेस संसदीय बोर्ड ने फूलपुर की उम्मीदवारी का फैसला बहुगुणा पर छोड़ रखा था। उस समय फूलपुर से कांग्रेस की ओर से जगपत दुबे का भी नाम चल रहा था। बहुगुणा उनके पक्ष में नहीं थे। विश्वनाथ प्रताप के उम्मीदवार बनने पर उनका दोहरा मकसद पूरा हो रहा था। एक जगपत दुबे किनारे लग रहे थे और दूसरे विश्वनाथ प्रताप की मदद बहुगुणा को उनके चुनाव क्षेत्र की मेजा तहसील में मजबूत करती। दूसरी तरफ विश्वनाथ प्रताप हिचक रहे थे। उन्होंने तब तक अपने विधानसभा क्षेत्र के बाहर कोई राजनीतिक सक्रियता नहीं रखी थी। जाहिर है कि फूलपुर क्षेत्र में उनके संपर्क सीमित थे। उन्हें लगता था कि वे अभी लोकसभा चुनाव लड़ने लायक ताकत नहीं संजो पाए हैं। दूसरी ओर बहुगुणा जी के दबाव के कारण विश्वनाथ प्रताप सिंह का नाम तेजी से चर्चा में था। यह खबर उस समय के संसोपा सांसद जनेश्वर मिश्र को भी मिली। इसके बाद जनेश्वर मिश्र का यह बयान अखबारों में छपा , " राजा (विश्वनाथ प्रताप) मुझसे क्या लड़ेंगे ? राजनीति में अभी उनके दूध के दांत भी नहीं उगे हैं। लड़ना हो तो इंदिरा गांधी मुझसे लड़ें।" वरिष्ठ पत्रकार राम बहादुर राय की किताब " मंजिल से ज्यादा सफर " में अपने साक्षात्कार में विश्वनाथ प्रताप सिंह ने बताया कि "उन्हें जनेश्वर मिश्र का बयान पढ़कर बुरा लगा। इस बयान को मैंने इंदिरा गांधी के लिए चुनौती माना।" सिविल लाइंस ,इलाहाबाद में अपने दोस्त राजेंद्र प्रताप सिंह के साथ कॉफी पी रहे विश्वनाथ प्रताप सिंह ने कहा कि मुझे चुनाव जरूर लड़ना चाहिए। वहां से सीधे बहुगुणा के पास पहुंचकर विश्वनाथ प्रताप ने चुनाव लड़ने की अपनी सहमति सूचित की। बहुगुणा ने ट्रेन के सफर की जगह बनारस पहुंच दिल्ली की फ्लाइट पकड़ी और विश्वनाथ प्रताप सिंह की उम्मीदवारी की घोषणा करा दी।चुनाव में अपनी जीत पक्की करने के लिए विश्वनाथ प्रताप ने बेहतर मैनेजमेंट किया। नामांकन के बाद दो -तीन दिन के लिए भूमिगत हो गए। ऑफिस से लेकर गाड़ियों और साधनों की व्यवस्था की रूपरेखा बनाई। एक गैरराजनीतिक मित्र त्रिलोचन पर मुख्य कार्यालय की जिम्मेदारी सौंपी जिसमें दिन भर वर्कर की शिकायतों और शाम को उम्मीदवार का गुस्सा झेलने की सहन शक्ति थी। हर बिरादरी के प्रभावशाली लोगों तक व्यक्तिगत पहुंच और बड़ी संख्या में पोस्टकार्डों के जरिए तमाम लोगों से संपर्क बनाया गया। फूलपुर के ब्राह्मण बाहुल्य कछार में राजेंद्र त्रिपाठी और बहादुरगंज में विद्याधर द्विवेदी का परिश्रम काफी काम आया। इस चुनाव में जनसंपर्क के लिए विश्वनाथ प्रताप सिंह ने खूब पदयात्रा की थी। कछार इलाके के गांवों और घनी बस्तियों के बीच यह मुश्किल काम था लेकिन प्रचार का प्रभावी तरीका था। लगातार चलने से पांवों में छाले भी पड़े और कुछ मौकों पर डॉक्टर की मदद से छालों का पानी निकलवाकर पैरों में पट्टी भी बंधी। जनेश्वर मिश्र बेहतरीन वक्ता थे। विश्वनाथ प्रताप उसकी काट में व्यक्तिगत संपर्क को जरूरी मानते थे। प्रतिद्वंदी खेमे की पदयात्राओं का मुकाबला करने के लिए जनेश्वर खेमे ने भी इसका सिलसिला शुरू की लेकिन जनेश्वर जल्दी ही थक गए। उन्होंने " हारूं या जीतूं। पदयात्रा मेरे बस की नहीं। विश्वनाथ प्रताप सिंह ने यह चुनाव जीत लिया था। जनेश्वर मिश्र तीसरे स्थान पर रहे। वोट थे - विश्वनाथ प्रताप सिंह (कांग्रेस) 1-23-095 बी.डी.सिंह (बी.के. डी.)56-315-जनेश्वर मिश्र (संसोपा)28-760