भरत से त्याग और समर्पण तो हनुमान से संयम व अनुशासन सीखें:-श्री मधुसूदन शास्त्री

 

भरत से त्याग और समर्पण तो हनुमान से संयम व अनुशासन सीखें:-श्री मधुसूदन शास्त्री

अयोध्या से आये कथा व्यास श्री मधुसूदन शास्त्री जी के श्रीमुख से सुल्तानपुर के विवेक नगर ग्राउंड में अनवरत अमृतमई श्री राम कथा में कल के सुंदरकाण्ड प्रकरण पर बताया गया की यदि जीवन में आदर्शवाद सीखना  है तो हमें मर्यादापुरुषोत्तम भगवान श्री राम के अनुज भरत से सीख लेनी होगी तथा यदि संयमित और अनुशासित जीवन में रहकर कुछ करना है तो भक्तशिरोमणि श्रीहनुमानजी से सीखना होगा। आज के इस प्रगतिवादी युग में जहां भाई-भाई से ,बेटा पिता से संपत्ति विवाद में उलझा हुआ है तो वहीं भरत ने अयोध्या की सम्पूर्ण संपत्ति को धूल समझकर भाई के वियोग में बिना किसी कारण के स्वयं को गुनहगार मानते हुए 14 वर्ष का वनवास लिया जिसके लिए वह लेशमात्रा भी जिम्मेदार नहीं थे। श्री हनुमानजी,सर्वशक्तिमान थे, लंका से मां सीता को सुरक्षित ला सकते थे लेकिन अनुशासित जीवन का आदर्श स्थापित करते हुए जामवंत जी के आदेशानुसार  मां जानकी की सूचना लेकर वापस आए । उन्होंने मां जानकी से कहा कि मां  मैं आपको अभी ले जा सकता हूं लेकिन हमारे आराध्य की आज्ञा नहीं है। वास्तव में इतने मार्मिक और रोचक तरीके से कथा का वर्णन सुनकर ऐसे लग रहा है जैसे साक्षात कागभुशुण्डि जी कथा सुना रहे हैं। श्री तुलसी मानस सेवा  समिति के संरक्षक श्री अशोक श्रीवास्तव, शेम्फोर्ड फ्यूचरिस्टिक स्कूल के प्रिंसिपल डॉक्टर अजय कुमार तिवारी, पूर्व प्रशासनिक अधिकारी प्रमोद श्रीवास्तव, आदर्श नगर सभासद विजय जायसवाल, निराला नगर सभासद सुधीर तिवारी ,पूर्व प्रशासनिक अधिकारी राममिलन शर्मा, समिति के कोषाध्यक्ष ओमप्रकाश मिश्रा, शरद तिवारी, आचार्य माता प्रसाद तिवारी, कथावाचक गोपाल जी एवं समिति के गणमान्य पदाधिकारी के साथ साथ हजारों की संख्या में श्रद्धालु सम्मिलित हुए।


 

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