चुनाव खत्म भिक्षावृत्ति खत्म कर्ज के बोझ में दबे नीतीश ने तब मनीऑर्डर किया था वापस

राज खन्ना

न्यू गीतांजलि टाइम्स सुल्तानपुर। अब वे कब किधर चले जाएं इसका किसी को नहीं पता ! विरोधी अब उन्हें पलटुराम कहते हैं।  लेकिन एक दौर वह भी था जब वे अपने वसूलों पर अडिग थे। यहां तक कि चुनाव बाद पहुंचे सहायता के मनीआर्डर की रकम वापसी के लिए नीतीश कुमार ने अपने दोस्तों को मजबूर कर दिया था। अपनी शिक्षक पत्नी की दिल्ली में प्रतिनियुक्ति पर सवाल उठने पर खुद पहल करके उन्हें पटना वापस भिजवा दिया था। 1977 की इमरजेंसी विरोधी लहर में भी जनता पार्टी के जो प्रत्याशी चुनाव नहीं जीत सके थे, उनमें 26 साल के नीतीश कुमार शामिल थे। जेपी आंदोलन की उपज नीतीश को हरनौत (नालंदा) में भोला प्रसाद सिंह से शिकस्त का सामना करना पड़ा था। पहली हार के बाद भी नीतीश का हौसला बरकरार रहा और वे हरनौत में लगातार सक्रिय रहे। 1980 में वे एक बार फिर वहां से उम्मीदवार थे। लेकिन उन्हें फिर निराश होना पड़ा। इस बार वे अरुण चौधरी से हारे जिन पर भोला बाबू का वरदहस्त था। उदयकांत की किताब " नीतीश कुमार : अंतरंग दोस्तों की नज़र से " में इस हार को इन शब्दों में बयान किया गया है 1980 में नीतीश कुमार को फिर से चुनाव में हरा दिया गया। सच में यह पराजय अभिमन्यु वध से भी अधिक अनैतिक थी। नीतीश समर्थक वोटरों को विरोधियों ने उनके गांवों की नाकेबंदी करके बंदूकों की नोक पर वोट देने जाने से रोक दिया था ।  उनके वोट विपक्षियों ने अपने उम्मीदवार के लिए छाप दिए। चुनाव कराने गए कर्मी अपनी जान की सलामती मांगते रहे। जमीर वाले कर्मियों की भरपूर पिटाई जैसी दवाइयों का हर बूथ पर इंतजाम था।" दो चुनावों की हार के बाद नीतीश की आर्थिक स्थिति और खराब हो चुकी थी। पत्नी मंजु नौकरी पाने की कोशिश कर रही थीं। नीतीश का चुनाव प्रबंध देखने वाले दोस्तों ने उधार लेकर प्रचार और मतदान के आखिरी दौर के खर्चों का इंतजाम किया था। लेकिन हार ने उन सबको उदास कर दिया। उधार की लटकती तलवार और परेशान कर रही थी। दोस्तों को कोई रास्ता नहीं सूझ रहा था। अचानक एक ऐसी रकम का मनीऑर्डर पहुंचा  जिससे उधार चुकता हो सकता था। साथी मुन्ना सरकार ये खुशखबरी लेकर नीतीश कुमार के पास पहुंच गए। नीतीश ने कहा कि अब जब चुनाव खत्म हो चुका है तो हम ये पैसे कैसे ले सकते हैं  मुन्ना का जवाब था कि उधार तो पहले का है । नीतीश फिर भी तैयार नहीं हुए। कहा कि अब ये पैसे लेना गलत होगा। इन्हें वापस कीजिए। उधार अपनी कमाई से चुकाएंगे। चुनाव खत्म तो भिक्षावृत्ति भी खत्म ! मनीऑर्डर से ही इस रकम की वापसी हुई थी। शुरुआती दो असफलताओं के बाद भी 1985 में नीतीश कुमार ने हरनौत से ही चुनाव लड़ने का फैसला किया। मतदान के दो -चार दिन पहले एक चुनावी सभा में नीतीश ने कहा था  इस बार भी अगर हरनौत की जनता ने नहीं जिताया तो मैं आप सबकी यथाशक्ति सेवा तो करता रहूंगा राजनीति छोडूंगा भी नहीं लेकिन फिर कभी चुनाव  नहीं लडूंगा।" हालांकि इस बार नीतीश को जीत का भरोसा था। उन्होंने अपने दोस्त अरुण से ठेठ मगही में तब कहा था  लगौ ही कि इ बार हम जीत जैबऊ ..(लगता है कि इस बार मैं जीत जाऊंगा)! साथ में यह भी कहा था कि अगर इस बार भी हार हुई तो राजनीति तो नहीं छोडूंगा लेकिन जेपी और किशन पटनायक की तरह चुनावी राजनीति से सन्यास ले लूंगा। उस दशा में वे समाजवादी सोच की पत्रिका निकालने और जनांदोलनों की अगुवाई की योजनाओं पर काम करने का इरादा रखते थे। नीतीश ने तीसरी हार की दशा में भविष्य की इन योजनाओं की जानकारी अपनी पत्नी मंजु से भी साझा की थीं। लेकिन ये नौबत नहीं आई। यह चुनाव नीतीश भारी अंतर से जीत गए थे। पहली जीत के बाद नीतीश का कद बढ़ता गया। 1989 में नीतीश और लालू दोनों लोकसभा का चुनाव जीतकर दिल्ली पहुंचे। लालू  ने अपनी आत्मकथा में लिखा है, " नीतीश कुमार और मैंने मंत्री बनने का प्रयास किया। हम अपनी ओर ध्यान खींचने की उम्मीद में पी एम ओ के आसपास अपना सबसे अच्छा कुर्ता -पाजामा पहनकर घूमा करते थे। हालांकि केंद्रीय मंत्री बनने की यह शुरुआती महत्वाकांक्षा जल्द ही खत्म हो गई। मेरा दिल बिहार में था और मैंने अपने करियर को अपने गृह राज्य में समर्पित करने का संकल्प लिया, जिसने मुझे इतना कुछ दिया था। " लेकिन नीतीश ने इससे इंकार किया है। अपने दोस्तों को कई मौकों पर उन्होंने बताया कि उनकी मंत्री बनने की मंशा कतई नहीं थी। अलबत्ता वह यदा - कदा लालू के साथ बड़े लोगों से मिलने चले जाया करते थे। दिल्ली पहुंचने के बाद नीतीश का गृहस्थ जीवन कुछ व्यवस्थित हो गया। कृषि राज्य मंत्री बनाए जाने के बाद उन्हें 1 सर्कुलर रोड बंगला  आबंटित हो गया। बिहार में शिक्षक की नौकरी कर रही पत्नी मंजु 1990 में प्रति नियुक्ति पर सूचना विभाग के दिल्ली दफ्तर पहुंच चुकी थीं। नीतीश की ऊंची उठती पतंग विरोधियों को खटक रही थी।  उनकी पत्नी मंजु की प्रतिनियुक्ति का मुद्दा उछला। बिहार के किसी अखबार में भी यह खबर छपी। 8 सितंबर 1990 को नीतीश ने बिहार के तत्कालीन मुख्यमंत्री लालू यादव को पत्र लिखा कि यद्यपि प्रतिनियुक्ति में किसी कायदे -कानून का उल्लंघन नहीं हुआ है , फिर भी इस संबंध में अखबार में छपी खबर से सरकार की छवि पर खराब असर पड़ा है। प्रतिनियुक्ति का आदेश रद्द करने के साथ ही अपनी पत्नी मंजु को पटना में पूर्व स्थान पर नियुक्त करने का नीतीश ने पत्र में आग्रह किया था। जल्दी ही मंजु की जे. डी. बालिका उच्चतर माध्यमिक विद्यालय  पटना के लिए वापसी हो गई।

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