हिंदुस्तान भले ही आजाद हो गया है परंतु हिंदुत्व आज भी जातिवादी विद्वैष का गुलाम है - डी पी गुप्ता

हिंदुस्तान भले ही आजाद हो गया है परंतु हिंदुत्व आज भी जातिवादी विद्वैष का गुलाम है - डी पी गुप्ता


जातिवादी नासूर से अफगानिस्तान, पाकिस्तान, बांग्लादेश आदि देशों में खुद को खत्म कर चुके हिंदुओं द्वारा अब हिंदुस्तान के भी कई हिस्सों में खोद डाली गई है अपनी आत्मघाती कब्र

सुलतानपुर, न्यू गीतांजलि टाइम्स सुलतानपुर। भारत भले विश्व का सबसे बड़ा लोकतंत्रिक देश है, परंतु यहां के समाज में जातिगत भेदभाव भी दुनिया के मुकाबले सबसे ज्यादा है। जिसका विश्लेषण करते हुए समाजसेवी पत्रकार डी पी गुप्ता एडवोकेट  अपना नजरिया व्यक्त करते हुए लिखते हैं कि, हजारों साल के गुलामी के बाद सन् 1947 में देश भले आजाद हो गया है परंतु हिंदू धर्म जातिवाद का आज भी गुलाम है। समय के साथ साथ हर धर्म और सभ्यता में कुरीतियां व्याप्त हो जाना स्वाभाविक है। जिसका निवारण समय समय पर अवतरित होने वाले महान विभूतियों द्वारा होता रहा है। हिंदुओं में ऐसी ही एक भयकंर कुरीति सती प्रथा भी व्याप्त हो चुकी थी जो राजा राममोहन राय के भगीरथ प्रयास से दूर हुई थी। दुखद स्थिति यह है कि जातिवादी कुरीतियां हिंदुओं में इतना गहरी जड़ें जमा चुकीं हैं कि , ये आजादी के कई दशक बीत जाने के बाद भी हिंदू समुदाय से दूर नहीं हो पा रहीं हैं। जातिवाद के चक्कर में बटें हिंदू कभी भी एक नहीं हो पाये,फलस्वरुप आजादी के पहले और बाद में ये अफगानिस्तान, पाकिस्तान, बांग्लादेश आदि जैसे खुद के देश में अपना अस्तित्व नहीं बचा पाये और नष्ट हो गये। आज अखंड भारत के बचे खुचे हिंदूस्तानी भूभाग के कई हिस्सों में भी हिंदू समुदाय या तो समाप्त हो गया है या फिर लुप्त होने की कगार पर है। आज राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ व भारतीय जनता पार्टी और उसके अनुषांगिक संगठन के साथ विश्व हिंदू परिषद, बजरंगदल के कार्यकर्ता लगातार हिंदुत्व के मुद्दों पर मुखर रहती हैं। जहां भी गैर हिंदुओं से कोई विवाद या समस्या होती है ,ये संगठन हमेशा आगे रहते हैं। परंतु दुर्भाग्य है कि इतनी अधिक संख्याबल और इतने मजबूत संगठन होने के बावजूद ये सब कभी भी खुद हिंदुओं में कैंसर की तरह जड़ जमा चुकी जातिगत विद्वेष की भावना को दूर करने हेतु कोई जमीनी कार्य नहीं करते हैं। उ प्र ,बिहार में होने वाले चुनावों में जातिवाद की भावना सबसे प्रबल स्वरूप में दिखाई देती है। राजनैतिक पार्टियां भी जातिवादी गणित को देखते हुए अपने प्रत्याशियों का चयन करती हैं। एक तरफ जहां भारतीय लोकतंत्र व संविधान में समानता के सिद्धांतों पर बल प्रदान करते हुए जातिवादीसोच को निकृष्ट और असंवैधानिक माना गया है , वहीं लोकतंत्र और संविधान की रक्षा के नाम पर बने राजनैतिक दल स्वयं चुनाव के समय, समाज में जातिवाद को सबसे‌ ज्यादा बढ़ावा देते चले आ रहे हैं। सब जानते हुए भी सरकार और चुनाव आयोग कभी भी इस पर कोई कठोर कार्यवाही नहीं करता है। हिंदुत्व को दरकिनार कर आज दो सवर्ण जाति ब्राह्मण और क्षत्रिय जहां आपस में एक नहीं हैं वहीं ओबीसी समुदाय स्वयं अपना अस्तित्व बचाने में लगा है। दलित समुदाय का एक बहुत बड़ा हिस्सा जाति-आधारित भेदभाव से उबकर हिंदू धर्म से पलायन कर चुका है । ओबीसी जातियों में भी कई ऐसी जातियां हैं जो हिंदू धर्म को केवल ऊंची जातियों का धर्म मान कर इससे दूरी बना चुकीं हैं। आज क्षत्रिय ब्राह्मण,अगड़े पिछड़े, हिंदू बौद्ध में पूरी तरह बंट चुके हिंदू धर्म को एकसूत्र में बांधने हेतु कोई आगे नहीं आ रहा है। देश में लगभग दस लाख से ज्यादा मंदिर और पांच लाख से ज्यादा साधु संत हैं और करोड़ों की संख्या में पुरोहित और अध्यात्म समर्थक लोग हैं। लाखों धार्मिक ट्रस्ट और सोसाइटी हैं फिर हिंदू धर्म के सब से बड़ी समस्या जातिवादी भेदभाव और जातिवादी सरनेम हटाने के लिए कोई आगे आकर आवाज बुलंद नहीं कर रहा है।

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